वरिष्ठ पत्रकार, कवि और साहित्यकार प्रेम कुशवाहा का निधन

बिलासपुर

ब्यूरो

वरिष्ठ पत्रकार, सुप्रसिद्ध कवि एवं व्यंगकार श्री प्रेम कुशवाहा का 90 साल की उम्र में आज दोपहर निधन हो गया।वे पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ्य चल रहे थे। उनका बिलासपुर के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था।आज दोपहर करीब 2 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।वे छत्तीसगढ़ सक्रिय पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव और बस्तर में पदस्थ न्यूज़ 18 के सीनियर रिपोर्टर विनोद कुशवाहा के पिता जी थे। उनकी अंतिम यात्रा उनके निवास स्थान चंदेला नगर रिंग रोड नम्बर 2 बिलासपुर से 10 नवम्बर को सुबह 11 बजे सरकंडा मुक्तिधाम के लिए रवाना होगी।वे अपने पीछे, बहु, बेटी, दामादऔर नाती पोतों सहित भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं।
कवि, साहित्यकार और व्यंगकार के रूप में पहजाने जाने वाले प्रेम कुशवाहा लोकगीतों के रचयिता के साथ ही 70 के दशक में लोकगीत गायक कलाकार के रूप में अपनी एक पहचान स्थापित की। एक कार्यक्रम देने के लिए अपने साथी कलाकारों के साथ मध्यप्रदेश के रीवा जा रहे थे उस दौरान जिस बस में वे सवार थे उसके लिलजी बांध में डूबने से हुई दुर्घटना में 110 लोगो की मौत हो गयी थी।इस दुर्घटना में अकेले प्रेम कुशवाहा ही सुरक्षित बचे थे।उसके बाद 1976 में उन्होंने अपनी लेखनी को जारी रखते हुए जबलपुर नवभारत से पत्रकारिता की शुरुआत की।
हमखे जोगनिया बना गए…अपन जोगी हो गए राजा…
पिंजरे में तोता और मैना बिठा गए.. बोली अनेकन रटा गए.. अपन जोगी हो गए राजा…

जैसे बुंदेली, छत्तीसगढ़ी बोली विधा में लिखे लोकगीतों के रचयिता के रूप में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई।उनके लिखे सैकड़ो देवी गीत, लोकगीत विविध भारती से प्रसारित होते रहे है।80 के दशक में उन्होंने व्यंगकार कवि के रूप में अपनी एक नई पहचान शुरू की,और कविसम्मेलनों के मंच पर वीर, हास्य और व्यंग बाणों की कलम से वे लोगो के बीच पहचाने जाते रहे।जबलपुर नवभारत में आईना कालम से भी उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई।साल 2000 में रिटायरमेंट से कुछ साल पहले वे परिवार के साथ बिलासपुर में शिफ्ट हो गये।यहाँ पर नवभारत,हाईवे चैनल, देश बंधु में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी।लेखनी से शुरू हुआ उनका जिंदगी का अंतिम सफर जिंदगी के आखिरी समय तक जारी रहा।
कुछ समय पहले ही उन्होंने एक अंतिम देवी गीत लिखा था…
ले चल मां के देश चिरैया… याद बहुत आती मेरी मैया.. ले चल मां के देस चिरैया..
लाख जतन कर कर के हारू…
पल पल छिन छिन राह निहारूँ…
बीच भंवर मेरी नांव फसी है..
पार लगा दो हे मेरी मैया…ले चल मां के देस चिरैया……

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